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BBC - EK MULAKAT WITH M J AKBAR

बीबीसी एक मुलाक़ात में मेहमान: वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर - April 19, 2009

एमजे अकबर


Part I

Part II

Part III

Part IV

ये सफ़र?

मुझे पहली नौकरी 1971 में मिली थी. तब मेरी उम्र 19-20 साल रही होगी. तब ऐसा नहीं था कि मुझे पत्रकारिता के साथ बहुत प्रेम था, इसलिए इसमें आया. नौकरी करनी थी, तनख़्वाह नहीं मिलती थी. नौकरी मिली तो पत्रकारिता में आ गया.

वाकई आप पत्रकारिता में ऐसे ही आ गए?

हाँ, बिल्कुल सही कह कर रहा हूँ. वो ज़माना था जब मैं मुंबई में फ्रीलांस करता था. फ्री प्रेस जर्नल में अय्यर साहब कॉलम लिखा करते थे. उनकी एक ख़ासियत थी कि वो बहुत शराब पीते थे. जब कभी वो पीकर लुढ़क जाते थे तो वहाँ मौजूद मुख्य उप संपादक मुझे कॉलम लिखने के लिए कह देते थे. और आपको बता दूँ कि इस कॉलम लिखने के बदले मुझे इडली-डोसा मिलता था.
1967-70 में मैंने ग्रेजुएशन की. तब नक्सल आंदोलन का बोलबाला था. बंगाल के प्रेसीडेंसी कॉलेज की कैंटीन में हमारे साथ कई ऐसे लोग बैठते थे जिन पर 10,000 रुपये का ईनाम था और इनमें से एक पर तो एक लाख रुपये का ईनाम भी था.

आपको सबसे पहले कब अहसास हुआ कि पढ़ने-लिखने का शौक है और अगर टाइपराइटर पर बैठूँगा तो एक अच्छी चीज़ निकलकर आएगी?

सच जवाब तो ये है कि इसकी जड़ में भी कुछ अहं है. मैं ये कहूँ कि देश सेवा के लिए इसमें आया तो गलत होगा. पढ़ने का बहुत शौक नहीं था. मैं स्टेट्समैन को संपादक के नाम पत्र लिखा करता था. एक-दो बार ये छपे तो जोश बढ़ गया. फिर जब मैं स्कूल में ही था तो स्टेट्समैन के संपादक पृष्ठ पर एक लेख छपा.

मैंने तेलनीपाड़ा कस्बे के बारे में लिखा था कि कैसे वहाँ एक गुरु आए. गुरु अंग्रेजी बोलते थे और लोग उनसे इतने प्रभावित हुए कि भक्त बन गए. मैं बोर्डिंग स्कूल से वापस आया और शायद अपने कस्बे में पहला अंग्रेजी बोलने वाला था. जब वो गुरु विलियम वर्डस्वर्थ की कविता पढ़ रहे थे मैंने अलग ले जाकर उनसे कहा कि ये कविता तो उनकी है ही नहीं. ये कहानी जब छप गई तो लिखने का कीड़ा लग गया.

जब आपने ये कहानी भेजी थी तो आपको अंदाज़ा था कि ये छपेगा ही?

बिल्कुल नहीं. जो भी ये कहता है ग़लत कहता है. दरअसल, बहुत लोग लिख लेते हैं, लेकिन जजमेंट नहीं होता. आहिस्ता-आहिस्ता तजुर्बे के साथ ही पता लगता है कि कौन सी चीज़ छपेगी और कौन सी नहीं. कहने का मतलब ये कि किस चीज़ के लिखने का कितना असर होगा, ये अनुभव से ही पता चलता है.

बीबीसी एक मुलाक़ात का सफर आगे बढ़ाएँ, अपनी पसंद का गाना बताएँ?

मैं समझता हूँ कि पत्रकारिता के पेशे के लिए ये गाना ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया’ एकदम फिट है.

आपकी किताबों ‘मेकिंग ऑफ़ इंडिया’, ‘सीज विदिन’ में ख़ास तरह का दृष्टिकोण नज़र आता है. क्या आप इतिहास पढ़ते थे. किस तरह से ये सब हुआ?

आपका सवाल बहुत जायज़ है. मुझे किताबें लिखने में बहुत समय लगता है. चार-पाँच साल. बहुत शोध करना पड़ता है. इसके लिए जो ऊर्जा होनी चाहिए वो होनी ज़रूरी है. कुछ ख़ास तलाश के लिए अंदर से आवाज़ आनी चाहिए. कहना चाहिए कि मेरी सारी किताबें एक तरह से ऑटोबायोग्राफ़ी हैं. मेरी ज़िंदगी की ऑटोबायोग्राफ़ी नहीं बल्कि मेरी सोच और देश में जो हो रहा है, उसकी ऑटोबायोग्राफ़ी हैं.
मेरे दिमाग में जो सबसे पहले सवाल आया कि इस देश के मुसलमानों ने 1940 से 1947 के बीच इस मुल्क को तोड़ दिया. क्या देश को तोड़ना जायज़ था या नाजायज़ था. इससे मुसलमानों पर क्या असर पड़ा. अगर मुल्क एक होता तो मुसलमानों की क्या स्थिति होती. अगर मुल्क एकजुट होता तो मुसलमानों की स्थिति क्या होती.

मुझे याद है कि ‘सीज विदिन’ में मैंने लिखा है कि अगर मुल्क एकजुट होता तो मुसलमान प्रथम श्रेणी के नागरिक होते, लेकिन विभाजन के कारण तीनों मुल्क़ों में तीसरी श्रेणी के नागरिक बन गए.
मुसलमानों के सामने अब क्या समस्याएँ हैं. हिंदुस्तान के मुसलमानों पर किसका साया था. मेरा मानना था कि जवाहरलाल नेहरू ने मुसलमानों को जो सहारा दिया इसी वजह से मैं उनकी तरफ खिंचा और उनके जीवन में बहुत कुछ पाया. उनकी ज़िंदगी में कई ग़लतियाँ भी थीं, लेकिन जिस शख़्स का एक-एक दिन इतिहास बन गया हो, उसमें गलतियाँ तो होंगी ही. ताज्जुब ये नहीं कि उन्होंने साल में पाँच दिन गलती की, ताज्जुब ये था कि साल में 360 दिन वो सही रहे.


नेहरू मेरे लिए गांधीजी के जीवन से ज़्यादा नज़दीक थे. उनकी विचारधारा हमारे लिए ज़्यादा उदारवादी और वैज्ञानिक थी.


इसके बाद ‘रायट आफ्टर रायट’ तो दंगो की कहानी है ही. मुरादाबाद, भागलपुर के दंगे. 1970-80 में शायद ही कोई दंगा हो जिसे मैंने कवर न किया हो. एक ख़ास बात है पिछले 15-20 साल में जो दो बड़े दंगे हुए हैं, वो बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद और दूसरा गुजरात में. इस अंतराल में सिर्फ़ दो दंगे. हिंदुस्तान बहुत खामोशी के साथ सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. उसकी एक वजह ये है कि नई पीढ़ी है उसे दंगों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है. उसे पता है कि मुंबई में या तो दंगे रहेंगे या फिर सेंसेक्स. वो जानता है कि ज़िंदगी में उसे नौकरी के साथ उलझना है या फिर खून के साथ.

बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, आपकी पसंद का एक गाना?

मुझे हेमंत दा का गाना ‘न तुम हमे जानो, न हम तुम्हें जाने’ बहुत पसंद है. इसके अलावा ‘जाएँ तो जाएँ कहां’ भी मुझे पसंद है. मुहम्मद रफ़ी का गाना है ‘दुनिया उसी की, जमाना उसी का’, गाइड फ़िल्म का गाना ‘गाता रहे मेरा दिल’ भी मुझे पसंद है.

आपकी पत्रकारिता की शुरुआत के दिनों में लौटते हैं. आप सबसे युवा संपादक थे. 24 बरस की उम्र में संपादक. ये ज़िम्मेदारी कैसे मिली?

ऑनलुकर के नाम से एक छोटा सा प्रकाशन था. एक बड़ी अच्छी सूफी कहावत है कि जब अल्लाह आपके हाथ से कोई चीज़ ले लेता है तो इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि कोई और चीज़ रखने के लिए आपका हाथ खाली करता हो. मुझे लगता है कि उन्हें शायद कोई और संपादक नहीं मिल रहा था. मैं इससे पहले इलस्ट्रेटिड वीकली में था. ढ़ाई साल मैंने खुशवंत सिंह के साथ काम किया था और ये अरसा बहुत कामयाब गुज़रा. 22 बार मेरा नाम कवर पेज पर छपा था. लोगों को यकीन नहीं होता था कि 22-23 साल का लड़का कवर पेज पर छप रहा है.

ऑनलुकर के बाद मैंने संडे मैगजी़न में काम किया. यहाँ से मैंने मैगजी़न में राजनीतिक पत्रकारिता को स्थापित किया. मालिकों को यकीन हो गया कि मैगजी़न में भी राजनीतिक ख़बरों को प्रमुखता से छापा जा सकता है. यानी राजनारायण की तस्वीर छापकर भी तीन लाख प्रतियां बेची जा सकती थीं.
1982 में मैं टेलीग्राफ़ से जुड़ा. लेआउट, फोटो, कॉमिक्स पेज जैसे बदलाव किए. हमने गंभीरता कभी नहीं छोड़ी, लेकिन किसी को बोर नहीं किया.

आप बहुत बड़ी-बड़ी शख्सियतों से मिले और उनके इंटरव्यू किए. नेहरू जी के अलावा आपकी पसंदीदा शख्सियतें?

1977 में जब आपातकाल के बाद सरकार चुनाव के बाद हारी तो मैं बहुत खुश हुआ. और जयप्रकाश नारायण ने उस दौरान जो बातें कहीं वो आज भी मौज़ू हैं. लोगों में आज भी भ्रष्टाचार को लेकर बहुत गुस्सा है. मैं समझता हूँ कि ग़रीबों के लिए जयप्रकाश नारायण की एक देन है कि बाक़ी बहुत कुछ बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार नहीं.

बतौर पत्रकार आपने युवावस्था में जो कामयाबी हासिल की, वो कहानी बाद में क्यों नहीं दोहराई जा सकी. मेरा मतलब एशियन एज से है?

पहली बात तो मार्केटिंग के लिए पैसा चाहिए. आपका प्रोडक्ट कितना ही अच्छा हो, मार्केटिंग नहीं है तो कुछ नहीं हो सकता. दूसरा, आप सफलता को दिल्ली से जोड़कर देखते हैं. एशियन एज की विज्ञापन ताक़त दक्षिण भारत में थी. जब मैं इस अख़बार को चेन्नई ले गया, प्रोडक्ट वही था, लेकिन नाम बदला हुआ था. तो इसका पहला प्रकाशन तीन लाख का था.

पत्रकारिता करियर के दौरान आपके यादगार लम्हे?

दो हादसे आपको बताता हूँ. मैं मुरादाबाद के दंगे कवर कर रहा था. कर्फ्यू में गलियों से गुज़र रहा था. पुलिस जाने नहीं दे रही थी. एक गली में चार-पाँच पुलिसवालों ने मुझ पर बंदूक तान दी. उस वक़्त अगर कुछ कर देते तो क्या होता, आख़िर कर्फ्यू था.
दूसरा हादसा मैंने अपनी आँखों से देखा जब दिल्ली में एक सिख को दंगाई जला रहे थे. तो दंगों से जुड़ी कई कहानियां हैं. मेरी किताब ब्लड ब्रदर्स भी इन्हीं घटनाओं पर है. दो-तीन दिन के इस नशे में इंसान जिस तरह हैवान बन जाता है, ये उसी इंसानी फितरत की कहानी है.
इसके अलावा जनरल ज़िया उल हक़, चौधरी चरण सिंह और राजीव गांधी के साथ इंटरव्यू बड़े मजे़दार थे. मोरारजी देसाई के साथ चार घंटे का इंटरव्यू दो दिन चला था. इंटरव्यू के बाद मोरारजी देसाई ने मुझसे कहा कि इस इंटरव्यू के 10 मिनट मैं इस्तेमाल न करूँ, उसमें उन्होंने कुछ निहायत ही निजी बातें कहीं थीं. मैंने ये इस्तेमाल नहीं की, क्योंकि मेरा मानना है कि कोई भी इंटरव्यू इज्ज़त के दायरे के बाहर नहीं होना चाहिए.

राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह. इनमें से सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व कौन लगा?

सब अपनी-अपनी जगह सही थे. नरसिम्हा राव के साथ मेरे रिश्ते बहुत अच्छे थे, लेकिन जिस दिन बाबरी मस्जिद गिर रही थी, बार-बार उनका दरवाज़ा खटखटाने के बाद एक ही आवाज़ आ रही थी कि साहब सो रहे हैं.

आप राजनीति में कैसे पहुँचे?

जैसे मैं दोस्ती के नाम पर बहुत जगह पहुँचा, वैसे ही राजनीति में पहुँचा. राजीव गांधी ने मुझसे चुनाव लड़ने के लिए कहा, मैं चुनाव लड़ गया. अगर वो ज़िंदा रहते तो माहौल बहुत बदला हुआ होता. देश की तस्वीर कुछ और होती.

राजीव गांधी में क्या ख़ास बात थी?

उनमें ख़ास बात ये थी कि उनमें विज़न था और यकीन था. मैं ये नहीं कहता कि उनकी काबलियत जवाहरलाल नेहरू जैसी थी. उनमें आंकाक्षा थी कि कैसे आसमान को छू लें. उस दौरान भी लोग उन पर हंसते थे कि कंप्यूटर की बातें हो रही हैं. लेकिन उनका संकल्प था और उन्होंने कर दिखाया.
जवान या नौजवान होना ही काफ़ी नहीं है. पढ़ाई-लिखाई भी ज़रूरी है. मतलब किताबी पढ़ाई से नहीं है. वो अपनी अक्ल से दिखा पाए कि कैसे हुकूमत चलती है.

आप अपनी राजनीतिक पारी से संतुष्ट थे?

मुझे जिस चीज़ में यकीन नहीं होता, मैं वो नहीं करता. मैं राजनीति में पूरे यक़ीन के साथ गया. जब मुझे लगा कि अब मेरी आत्मा इजाज़त नहीं दे रही है, तो मैं हट गया. उस वक़्त मैं कांग्रेस का प्रवक्ता था, लेकिन तब भी हटने के समय मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. मेरे अंदर से आवाज़ आई कि ये जगह मेरे लिए पाक नहीं रही, इसलिए मैं इससे हट गया.

फ़िल्में पसंद हैं आपको?

देव आनंद साहब की फ़िल्म गाइड बहुत अच्छी फ़िल्म थी. उसके बाद जॉनी मेरा नाम. लेकिन गाइड बेमिसाल थी. अगर वो गाइड के बाद कुछ न करते तो शायद अच्छा होता.
उस वक़्त दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद का ही जलवा था. दिलीप कुमार को रोने-धोने से ही फुरसत नहीं मिलती थी. हालाँकि जिसने कोहिनूर देखी होगी, उसे पता होगा कि दिलीप साहब कॉमेडी भी बहुत अच्छी करते थे. राजकपूर नैतिकता का कुछ ज़्यादा ही पाठ पढ़ाते थे.
देव आनंद की फ़िल्मों में कुछ अलग किस्म का संदेश था. वो ज़मीन से जुड़ी भूमिकाएं करते थे.

आज के ज़माने में आपके पसंदीदा अभिनेता, अभिनेत्री?

आज के अभिनेता बहुत प्रतिभावान हैं. लेकिन मुझे लगता है कि उनमें दिल की जगह कंप्यूटर फिट है. कभी-कभी लगता है कि इनमें खून नहीं है. सबका ध्यान अपने शरीर पर है. इन लोगों ने दारा सिंह को कहीं पीछे छोड़ दिया है.


अभिनेताओं के मुक़ाबले अभिनेत्रियां ज़्यादा विनम्र हैं. वे बहुत खूबसूरत हैं.

आपने हाल में कौन सी फ़िल्में देखी?

हाल ही में मैंने टेलीविज़न पर शर्मिला टैगोर की फ़िल्म अनुपमा देखी. इसे देखने के बाद मैंने शर्मिला टैगोर को एसएमएस भी भेजा.

पत्रकारिता में आपको किसका लिखा पसंद आता है?

कई हैं. स्वामीनाथन अय्यर, हालाँकि मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह नहीं जानता. लेकिन वो बहुत सीधा और अच्छा लिखते हैं. एस मुलगांवकर भी अच्छा लिखते थे, श्यामलाल भी हैवीवेट थे. गिरिलाल जैन भी बहुत बेहतरीन लिखते थे.

युवा और उभरते पत्रकारों के लिए क्या टिप्स देना चाहेंगे?

सबसे पहले मैं ये कहना चाहूँगा कि अगर पत्रकारिता में लिखने के लिए आ रहे हैं तो भूल जाएँ. पत्रकारिता में लिखने के लिए नहीं बल्कि दूसरों तक बात पहुँचाने के लिए आते हैं.
मैं बार-बार कहता हूँ कि क्या मैं शैक्सपीयर और जेम्स जॉयस को ट्रेनी जर्नलिस्ट की हैसियत से नौकरी देता कि नहीं. शैक्सपीयर को दे देता क्योंकि वो हंसाना जानते थे, लेकिन जेम्स जॉयस को नहीं देता.
टेलीविज़न पत्रकारिता के बारे में कहूँगा कि अंदर कुछ है नहीं, लेकिन कहने को बहुत है. इसका खोखलापन संकट के समय खुलकर दिखता है. ग़ौर से आधा घंटा टेलीविज़न देखिए, आपको पता चल जाएगा कि कितनी सतही जानकारी दी जाती है. जानकारी होनी ज़रूरी है. मुल्क के इतिहास के बारे में पता नहीं है तो कैसे आप इंटरव्यू कर सकते हैं.

बीबीसी एक मुलाक़ात के सफर में आपकी पसंद के कुछ और गाने?

गाइड का गाना ‘हाय रे हाय’, मुग़ले आज़म का गाना ‘ख़ुदा निगेहबां हो तुम्हारा’, और हेमंत दा का गाना ‘या दिल की सुनो दुनिया वालों’ मुझे पसंद है.

अच्छा, आप किस एक शख्स को डिनर पर ले जाना पसंद करेंगे?

दीपिका पादुकोण से मैं कभी नहीं मिला हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि वो काफ़ी सुलझे हुए दिमाग की हैं. मुझे लगता है कि उन्हें पता है कि ग्लैमर के सिवाय भी दूसरी दुनिया है.

आपके जीवन के सबसे शर्मसार कर देने वाले पल?

बहुत से हैं, लेकिन उस पल मैं बहुत शर्मसार हुआ था जब मुझे पक्का यक़ीन था कि मैं जीत रहा हूँ और पता चला कि मैं चुनाव हार गया हूँ. एक बात कहूँ. जब आदमी जीतता है तो समझता है कि वो जीता है, लेकिन जब हारता है तो पता चलता है कि वोट कोई और देता है.

कोई ऐसी चीज़ जिसे पूरा करने की तमन्ना हो?

अंटार्कटिका जाना चाहता हूँ. मैं कई आइसबर्ग तक तो चला गया हूँ, लेकिन अंटार्कटिका जाने की इच्छा है. वहाँ जाना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन वहाँ जाने के लिए वक़्त चाहिए और दूसरा वहाँ दो दिन से ज़्यादा नहीं रह सकते.

कोई ऐसी जगह जहाँ बार-बार जाने का मन करता हो?

मुझे मसाईमारा जाने का मन बार-बार करता है. एक बार मैंने वहाँ 28 बब्बर शेर देखे. उनमें से दो नर शेर थे, पाँच शेरनियां और बाकी बच्चे. क्या नज़ारा था. बच्चे खेल रहे थे, माएँ एकदम अलर्ट और नर शेर खर्राटा लेकर सो रहा था.

Sources: BBC Ek Mulakat

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